पं देवी राजनंदिनी ने बताई राजा परीक्षित की जन्म कथा , दुनावा में प्रारंभ है भागवत कथा और ज्ञान यज्ञ

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प्रकाश सूर्यवंशी दुनावा

मुलताई- दुनावा रामलीला मैदान दुर्गा मंदिर झील चौक मे पं देवी राजनंदिनी ( अयोध्या धाम )के मुखारविंद से भव्य संगीतमय श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ का आयोजन रखा गया है।

कथा के चौथे दिन  देवी राजनंदनी जी ने राजा परीक्षित के जन्म की कथा का वर्णन किया उन्होंने बताया कि राजा परीक्षित अर्जुन के पौत्र थे और अभिमन्यु और उत्तरा के बेटे थे जब अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र उत्तरा की तरफ कर दिया था तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें अपनी मां की कोख मे ही उन्हें बचाया था।  परीक्षित को अपनी मां की कोख में ही भगवान श्री कृष्ण के दर्शन हो गए थे पैदा होने के बाद वह जिस किसी से भी मिलते वह उन्हें श्री कृष्ण की छवि ढूंढने की कोशिश करते हैं यह उनके लिए एक परीक्षा जैसा ही था इसीलिए उनका नाम परीक्षित पड़ा ।

परीक्षित का विवाह उत्तर के राजकुमार की बेटी इरावती से हुआ इरावती और परीक्षित के चार बेटे हुए इसमें एक जन्मेजय था परीक्षित ने गंगा नदी के किनारे चार अश्वमेघ यज्ञ किए थे उनके गुरु कृपाचार्य थे जब पांडव महाभारत के बाद स्वर्ग की ओर प्रस्थान कर गए तब परीक्षित ने उन का कार्यभार और शासन संभाल लिया।  देवी राजनंदनी जी ने आगे बताया कि गायत्री मंत्र को कभी भी जोर से उच्चारित नहीं करना चाहिए क्योंकि यह मंत्र भेद का मंत्र है और भेद का मंत्र मन ही मन पढ़ा जाता है बाकी के मंत्र जिस भी प्रकार जपना चाहे जप सकते हैं। ओम नमः शिवाय का मंत्र 48 बार जपने से भगवान शिव तुम्हें किसी भी रूप में दर्शन देते हैं । देवी राजनंदिनी जी ने कथा में आगे बताया कि हमने उस पावन भूमि पर जन्म लिया है जहां भगवान श्री राम और भगवान श्री कृष्ण ने जन्म लिया है यहां कण कण में भगवान बसते हैं ।इस धरा पर जन्म लेने से तो धन्य होते ही हैं मरने के बाद भी धन्य हो जाते हैं इस प्रकार हमे भारत की धरा  का वंदन करते रहना चाहिए।


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